“बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी” शारदा सिन्हा के लोकप्रिय लोकगीतों में शामिल एक भावपूर्ण गीत है। इस गीत में अपने घर-आँगन, नगर और धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है। गीत की पंक्तियों में भक्ति, अपनापन और अपनी मिट्टी से जुड़ाव की सुंदर झलक मिलती है।
शारदा सिन्हा ने मैथिली, भोजपुरी और मगही लोकसंगीत को देश-विदेश में पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके गीतों में बिहार और आसपास के क्षेत्रों की लोकपरंपरा, त्योहार, संस्कार और ग्रामीण जीवन की सहज अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी – गीत
नीचे इस लोकगीत का पाठ दिया गया है:
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी,
हो हो.… अपन नगरी झारखण्ड नगरी - २
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी,
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी,
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी,
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी,
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी,
हो हो.… अपन नगरी झारखण्ड नगरी - २
बाबा नेने चलियौ हमरो अपन नगरी।
शारदा सिन्हा और लोकसंगीत
शारदा सिन्हा भारतीय लोकसंगीत की उन प्रमुख गायिकाओं में रही हैं जिन्होंने बिहार की लोकसंस्कृति को व्यापक पहचान दिलाई। उनके गीतों में लोकजीवन की खुशियाँ, पारिवारिक रिश्ते, पर्व-त्योहार और धार्मिक आस्था प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
उनकी आवाज़ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता और लोकभाव से जुड़ाव रही। यही कारण है कि शारदा सिन्हा के लोकगीत कई पीढ़ियों के बीच लोकप्रिय रहे हैं।
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